अर्थ
रुद्र-गण, आदित्य-गण, वसु-गण, साध्य-गण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुत-गण, पितरों के समुदाय तथा गंधर्व, यक्ष, असुर और सिद्ध-समुदाय — ये सभी विस्मयपूर्वक आपको निहारते हैं।
टीका
श्लोक में जिन देवताओं या प्राणियों का उल्लेख है, उनके विषय में थोड़ी स्पष्टता नीचे दिए विवरण से आएगी। साध्य : मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभाव, विभु—ये सात 'साध्य' हैं। (वायु पुराण 66:15-16) विश्वेदेव : क्रतु, दक्ष, श्रव, सत्य, काल, काम, धुनि, कुरुवान, प्रभवान और रोचमान—ये दस विश्वेदेव हैं। (वायु पुराण 66:31-32)
पितर : कव्यवाह, अनल, अर्यमा, अग्निष्वात्त, सोम, यम और बहिर्षत।
गंधर्व : ये स्वर्गलोक के गायक हैं।
यक्ष : महर्षि कश्यप की पत्नी खसा से यक्षों की उत्पत्ति हुई, ऐसी मान्यता है।
असुर : दैत्य, दानव और राक्षस—इन्हें असुर कहा जाता है। ये देवताओं के विरोधी माने जाते हैं।
संस्कृत श्लोक
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ ११:२२ ॥
पदच्छेद
रुद्र-आदित्याः, वसवः, ये च साध्याः,
विश्वे, अश्विनौ, मरुतः च, ऊष्मपाः च; गन्धर्व-यक्ष-असुर-सिद्ध-सङ्घाः वीक्षन्ते त्वाम् वि-स्मिताः च एव सर्वे।।