अर्थ
ऊपर की ओर (ब्रह्म में) जड़ें और नीचे की ओर (संसार में) शाखाओं वाले जिस अश्वत्थ के वृक्ष को अविनाशी कहते हैं, तथा छंद जिसके पत्ते हैं, उस वृक्ष के सत्य को जो जानता है, वह वेद के अभिप्राय को जानता है।
टीका
वृक्ष का यहाँ रूपक के रूप में प्रयोग हुआ है। अनुगीता में इसे ही 'ब्रह्म-वृक्ष' कहा गया है—अर्थात ब्रह्म का संसार-रूपी प्रसार। ब्रह्म के इस संसार-रूपी विस्तार को 'अव्यय' या 'अविनाशी' इसलिए कहा गया, क्योंकि सृष्टि और प्रलय के सिलसिले के बावजूद यह पसारा अनादिकाल से चलता आ रहा है। यह उस अर्थ में 'अविनाशी' नहीं है, जिस अर्थ में ब्रह्म अविनाशी है; लेकिन अनंत काल से लगातार अस्तित्व में आते-जाते रहने से यह एक अर्थ में अविनाशी ही हुआ।
संस्कृत श्लोक
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १५:१ ॥
पदच्छेद
ऊर्ध्व-मूलम्, अधः-शाखम्, अश्वत्थम् प्राहुः अ-व्ययम्;
छन्दांसि यस्य पर्णानि, यः तम् वेद, सः वेद-वित्।