अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग
श्लोक 15:14

अर्थ

भगवान श्री कृष्ण बोले

मैं वैश्वानर-रूप जठाराग्नि होकर प्राणियों की देहों में स्थित हूँ, तथा प्राण और अपान (श्वास-प्रश्वास) से युक्त होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

टीका

प्राण' को आप्टे के शब्दकोष में यों बताया गया है: "1) साँस, श्वास; 2) जीवन की साँस, जीवन-शक्ति, जीवन, जीवन-दायी वायु... प्राण गिनती में पाँच हैं—प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान; 3) जीवन के पाँच प्राणों में पहला, जिसका स्थान फेफड़े हैं।"

'अपान' को आप्टे के शब्दकोष में यों परिभाषित किया गया है—"श्वास बाहर निकालना, श्वास लेने की क्रिया, शरीर में रहने वाले पाँच पवनों में से एक जो नीचे की ओर जाता है तथा गुदा के मार्ग से बाहर निकलता है।"

चार प्रकार के अन्न: भक्ष्य या भोज्य (खाने-चबाने योग्य), चोष्य (चाटने योग्य), लेह्य (चूसने योग्य), पेय (पीने योग्य)।

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवान् उवाच

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।

प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १५:१४ ॥

पदच्छेद

अहम् वैश्वानरः भूत्वा, प्राणिनाम् देहम्-आश्रितः,

प्राण-अपान-सम्-आ-युक्तः, पचामि अन्नम् चतुः-विधम्।

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