अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग
श्लोक 15:8
अर्थ
भगवान श्री कृष्ण बोले
वायु गंध के स्थान से गंध को जैसे {ग्रहण करके ले जाती है, वैसे ही} देह की स्वामिनी जीवात्मा भी जिस {स्थूल शरीर} का त्याग करती है उससे मन और इंद्रियों के संस्कारों को ग्रहण करके उन्हें अपने नए शरीर में लेती जाती है।
टीका
मरने के समय, जिस दृश्यमान देह का प्राणी त्याग करता है, उसे स्थूल शरीर कहते हैं। लेकिन जीव के पास मन और सूक्ष्म इंद्रियों वाला एक सूक्ष्म शरीर भी होता है, जिसे लेकर वह दूसरे स्थूल शरीर में जाता है (वेदांतसूत्र, 3:1:1)। सांख्य मत के अनुसार यह सूक्ष्म शरीर महान-तत्त्व से लेकर सूक्ष्म तन्मात्राओं तक के अठारह तत्त्वों से निर्मित होता है।
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवान् उवाच
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ १५:८ ॥
पदच्छेद
शरीरम् यत् अवाप्नोति यत् च अपि उत्-क्रामति ईश्वरः,
गृहीत्वा एतानि संयाति, वायुः गन्धान् इव आशयात्।
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