अध्याय 17: श्रद्धा त्रय विभाग योग
श्लोक 17:1

अर्थ

अर्जुन बोले

हे श्रीकृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र-विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए यज्ञ-पूजा आदि करते हैं, उनकी निष्ठा (श्रद्धा, स्थिति, अवस्था) फिर कौन-सी है? सत्त्वगुणी है, अथवा रजोगुणी या तमोगुणी?

टीका

श्रीकृष्ण ने अभी-अभी, सोलहवें अध्याय के अंत में, कर्म-अकर्म का निर्णय करने में शास्त्र की प्रधानता की बात की थी। लेकिन हर कोई हर मामले में शास्त्रों के विचारों के बारे में सटीक तौर पर नहीं जान सकता है। किसी भी मामले में बहुत सारे अलग-अलग विचारों को रखने वाले बहुत-सारे शास्त्र भी हैं। इसलिए, अर्जुन को यह प्रश्न पूछना पड़ा।

'शास्त्र' किन ग्रंथों को माना जाए और किन ग्रंथों के हिसाब से चला जाए, इस पर हिंदू विद्वानों में बहुत मतभेद रहता है—इतना मतभेद रहता है कि एक विद्वान सिरे से दूसरे पक्ष के मत को खारिज कर देता है। हिंदू धर्म की अराजक स्थिति और पतन का यह एक बड़ा कारण है। इसी अस्पष्टता और अराजकता (अनुशासनहीनता) के कारण हिंदू धर्म संख्यात्मक और भौगोलिक तौर पर कम होता चला जा रहा है, जबकि वे धर्म जिनके पास आधार-ग्रंथ के रूप में एक ही मुख्य शास्त्र है, संख्यात्मक और भौगोलिक रूप से फैलते जा रहे हैं। भगवद्-गीता के अधिकतर टीकाकार—झमेले से बचते हुए, मगर पाठक को भ्रमित छोड़कर—बिना 'शास्त्र' को परिभाषित किए और बिना 'शास्त्र' शब्द का मतलब स्पष्ट किए आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन शंकराचार्य ने भगवद्-गीता के अपने भाष्य में 'शास्त्र' का मतलब स्पष्ट किया है—'श्रुति-स्मृति आदि'। श्रुतियाँ और स्मृतियाँ इतनी संख्या में हैं, और इतने भिन्न-भिन्न विचार रखती हैं, कि इस परिभाषा से कोई विशेष लाभ नहीं दिखता। फिर इनमें 'आदि' भी लगा दिया गया है। श्रुति (वेदों) में क्या शामिल करें—सिर्फ संहिता भाग या अन्य भी—इस पर भी हिंदू विद्वान एकमत नहीं रहते। 'स्मृति' के अर्थ के विषय में तो और भी मतभेद हैं। कुछ विद्वान सिर्फ मनुस्मृति को स्मृति मानते हैं, तो अन्य विद्वान दर्जन-भर अन्य स्मृतियों (जिन ग्रंथों के नाम में ही 'स्मृति' शब्द जुड़ा है, जैसे 'याज्ञवल्क्य स्मृति') के साथ-साथ इतिहास (महाभारत, तीन सौ रामायण) और पुराण, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र आदि सभी को स्मृति ही मानते हैं। इस मति-भ्रम को दूर करने हेतु समय आ गया है कि सभी हिंदू अब सिर्फ एक ग्रंथ को आधार-ग्रंथ और सर्व-प्रमुख शास्त्र बनाकर चलें, और बाकी को वहीं तक मानें जहाँ तक वे मूल आधार-ग्रंथ के विरोध में नहीं जाते हों। तभी मानसिक स्पष्टता आएगी कि क्या करें और क्या न करें। वह एक ग्रंथ आज भगवद्-गीता के सिवाय दूसरा कोई हो ही नहीं सकता। भगवद्-गीता में विभिन्न मतों का समन्वय भी है, और विभिन्न मतों के लिए स्थान भी। लगभग सभी संप्रदाय अपने मत के समर्थन या संरक्षण के लिए भगवद्-गीता के श्लोकों में आश्रय लेते हैं। दुनिया भर में—हिंदू समाज और हिंदू समाज से बाहर भी—अगर किसी एक ग्रंथ का सर्वाधिक आदर है, तो वह भगवद्-गीता ही है, वेद या वेदांत-सूत्र नहीं।

संस्कृत श्लोक

अर्जुन उवाच

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।

तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥ १७:१ ॥

पदच्छेद

ये शास्त्र-विधिम् उत्-सृज्य, यजन्ते श्रद्धया-अन्विताः,

तेषाम् निष्ठा तु का कृष्ण— सत्त्वम् आहो, रजः, तमः?

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