अर्थ
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरों के धर्म अर्थात दूसरों के स्वभाव-सम्मत कर्म से गुण-रहित भी अपना धर्म या खुद का स्वभाव-सम्मत कर्म श्रेष्ठ होता है, क्योंकि अपने सहज स्वभाव या नैसर्गिक प्रकृति द्वारा प्रेरित और नियत कर्मों का आचरण करने के क्रम में कम दोष या त्रुटियाँ होती हैं।
टीका
'किल्विषम्' के कई अर्थ होते हैं। आप्टे के शब्दकोष में निम्नलिखित अर्थ दिए हैं - 1) पाप 2) त्रुटि, अपराध, क्षति, दोष 3) रोग, बीमारी। इस श्लोक में त्रुटि, दोष भी अभिप्रेत हैं, क्योंकि स्वभाव के अनुकूल कार्य करने में मन अधिक लगता है और अधिक दक्षता प्राप्त होने की संभावना रहती है, जिससे कम त्रुटियाँ या दोष होते हैं। मन लगने से काम अधिक निष्ठा-पूर्वक होते हैं इसलिए 'पाप' भी कम होते हैं। एक ब्राह्मण-कर्मी के यहाँ पैदा हुआ व्यक्ति भी अगर सेना में भरती होकर युद्ध करने का स्वभाव रखता है, अर्थात क्षत्रिय-स्वभाव रखता है, और उसका मन शास्त्र पढ़ने और पुरोहित का काम करने में नहीं लगता, तो उसे अपने स्वभाव के अनुकूल ही कर्म करने में सिद्धि या सफलता मिलने की अधिक संभावना रहेगी। अगर वह ब्राह्मण का कर्म करने को बाध्य किया जाएगा तो अपना काम ठीक से नहीं करेगा, और पाप का ही भागी होगा! इसी प्रकार अगर ब्राह्मण या पुरोहित परिवार में जन्मे पुत्र या पुत्री को नर्स या डॉक्टर बनने की इच्छा हो क्योंकि उन्हें यही सेवा-कार्य स्वभाव से अच्छा लगता है, जो कि भगवान के अनुसार श्लोक में 18:44 में 'परिचर्या' कार्य है और शूद्र का स्वभाव-जन्य कार्य है, तो उनके लिए वही कर्म श्रेष्ठ होगा। इसी प्रकार अगर एक सेवाकर्मी शूद्र के घर पैदा हुई संतान का शास्त्र पढ़ने-पढ़ाने, ज्ञान-विज्ञान प्राप्त करने और तपश्चर्या करने का सहज स्वभाव हो तो उसे वही ब्राह्मण-कर्म करना उचित होगा। इसी स्वाभाविक कर्म में उसे अधिक सिद्धि यानी सफलता मिलेगी। जहाँ तक ईश्वर-प्राप्ति की बात है तो भगवान ने पहले ही स्पष्ट कर रखा है कि कोई भी कर्म, जो कुकर्म नहीं हो, अगर ईश्वर को समर्पित करके या ईश्वर के लिए कोई करता हो, तो उस कर्म के माध्यम से वह ईश्वर को प्राप्त कर पाएगा।
संस्कृत श्लोक
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ १८:४७ ॥
पदच्छेद
श्रेयान् स्व-धर्मः, विगुणः पर-धर्मात् सु-अनुष्ठितात्;
स्वभाव-नियतम् कर्म कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषम्।