अध्याय 18: मोक्ष सन्न्यास योग
श्लोक 18:54

अर्थ

भगवान श्री कृष्ण बोले

ब्रह्मभूत हो जाने पर प्रसन्नचित्त होकर वह किसी की आकांक्षा नहीं करता है, तथा सभी प्राणियों में समभाव होकर मेरी परम भक्ति को प्राप्त कर लेता है।

टीका

श्लोक 49 से 54 में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि सांख्य-योग, अर्थात संन्यास-योग — जिसमें संसार से संन्यास लेकर निराकार ईश्वर की उपासना, या तो ज्ञान-योग अथवा ध्यान-योग से की जाती है — भी कर्म-योग की तरह नैष्कर्म्य-सिद्धि (अर्थात कर्म-फलों में आसक्ति का पूर्ण त्याग) और अंततः भक्ति-योग की परा-भक्ति (सर्वोच्च भक्ति) भी साधक को प्रदान कर देता है। अर्थात, अंत में चलकर भिन्न अध्यात्म-मार्ग एक ही जगह मिल जाते हैं।

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवान् उवाच

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।

समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ १८:५४ ॥

पदच्छेद

ब्रह्म-भूतः प्रसन्न-आत्मा न शोचति न काङ्क्षति;

समः सर्वेषु भूतेषु, मत्-भक्तिम् लभते पराम्।

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