अध्याय 4: ज्ञान कर्म सन्न्यास योग
श्लोक 4:34

अर्थ

भगवान श्री कृष्ण बोले

उस ज्ञान को तुम तत्त्वदर्शी (सत्य जानने वाले) ज्ञानियों के पास जाकर जानो। उनको भलीभाँति प्रणिपात (प्रणाम) करने से, उनकी सेवा करने से, और {विनम्रता-पूर्वक} परिप्रश्न करने से वे उस आध्यात्मिक ज्ञान का उपदेश करेंगे,

टीका

भगवद्-गीता जिस समय कही गई थी, उस समय छापाखाने का निर्माण नहीं हुआ था, और आध्यात्मिक ज्ञान इतनी सहजता से छपी हुई पुस्तकों के रूप में उपलब्ध नहीं था। किन्तु आज आध्यात्मिक ज्ञान बहुत कुछ प्रामाणिक ग्रंथों—जैसे भगवद्-गीता, भागवत-पुराण, रामचरितमानस आदि—का अध्ययन कर प्राप्त किया जा सकता है। मगर केवल शब्द-ज्ञान प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं होता। उसके पश्चात साधना-पद्धति और उपासना-पद्धति का व्यावहारिक ज्ञान इस श्लोक (गी. 4.34) में बताए गए ज्ञानियों, महात्माओं, संतों और अध्यात्म-विदों से विशेष रूप से प्राप्त किया जाना आवश्यक होता है।

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवान् उवाच

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ४:३४ ॥

पदच्छेद

तत् विद्धि प्रणिपातेन, परि-प्रश्नेन, सेवया,

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम्, ज्ञानिनः तत्त्व-दर्शिनः।

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