अर्थ
वह योगी मुझको सब यज्ञ और तपों का भोक्ता, सारे लोकों और देवताओं का महा-ईश्वर तथा सारे प्राणियों का सुहृद या हितैषी जानकर शांति-लाभ करता है।
टीका
सभी धर्मों में ईश्वर को सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान एवं सर्वव्यापी मानते हैं। लेकिन अगर ऐसी महान सत्ता नेक नहीं हुई, 'मैलिन जेनी' हुई, तो एक बहुत विकट स्थिति उत्पन्न हो सकती है। कुछ लोग, जिनके साथ अकसर बुरा घटित होता रहता है, यह महसूस करते रहते हैं कि ईश्वर उनके पीछे पड़े हुए हैं और वे ईश्वर से भयभीत रहते हुए अपनी शांति खो बैठते हैं। लेकिन ऐसी धारणाएँ मिथ्या हैं। ईश्वर नहीं, हमारे स्वयं अपने कर्म और उनके फल ही हमारे पीछे लगे रहते हैं। इस श्लोक में ईश्वर ने स्पष्ट किया है कि वे सभी जीवों के सुहृद अर्थात सखा या मित्र हैं। जब ऐसा भाव हमारे अंदर भी आ जाता है कि ईश्वर हमारे सखा हैं, तो हमारा मन शांतिलाभ करता है। हम विपरीत परिस्थितियों में इस सर्वशक्तिमान और सर्वत्र उपस्थित सखा को हमेशा याद कर सकते हैं, और इस सखा से मदद की गुहार लगा सकते हैं। और वह सखा क्या जो थोड़ी मदद न करे, रास्ता न दिखाए?
संस्कृत श्लोक
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ ५:२९ ॥
पदच्छेद
भोक्तारम् यज्ञ-तपसाम्, सर्व-लोक-महा-ईश्वरम्,
सुहृदम् सर्व भूतानाम् ज्ञात्वा माम्, शान्तिम् ॠच्छति।