अध्याय 6: ध्यान योग
श्लोक 6:1

अर्थ

भगवान श्री कृष्ण बोले

जो मनुष्य कर्मों के फल पर आश्रित न होकर, अर्थात कर्म-फल से अनासक्त होकर, करने-योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है— केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं होता है, तथा केवल क्रियाओं-कर्मों का त्याग करने वाला व्यक्ति संन्यासी-योगी नहीं है।

टीका

अग्निहोत्र कर्म (अग्नि में हवन) सनातन धर्म में गृहस्थ-जीवन में रोज करने की परंपरा रही थी। मगर संन्यास लेने के बाद संन्यासी इसका भी त्याग कर सकते थे (मनुस्मृति 6:25)। कुछ दूसरे विद्वानों के अनुसार 'अग्नि का त्याग' से यहाँ भोजन पकाने की क्रिया का त्याग अभीष्ट है। अग्नि के त्याग की इसी मान्यता के कारण संन्यासियों का मृत्यु के बाद अग्नि-संस्कार नहीं होता, बल्कि भू-समाधि या जल-समाधि दी जाती है।

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवान् उवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।

स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ ६:१ ॥

पदच्छेद

अन्-आश्रितः कर्म-फलम्, कार्यम् कर्म करोति यः—

सः सन्न्यासी च, योगी च, न निर्-अग्निः, न च अ-क्रियः।

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