अध्याय 6: ध्यान योग
श्लोक 6:17

अर्थ

भगवान श्री कृष्ण बोले

दुःखों का नाश करने वाला यह योग तो उपयुक्त आहार-विहार करने वाले को और उचित सोने तथा जागने वाले को ही सिद्ध होता है।

टीका

जो पराए मांस से अपने मांस को बढ़ाना चाहता है, वह जहाँ कहीं भी जन्म लेता है, वहीं उद्वेग में पड़ा रहता है। जैसे अपने मांस को काटना पीड़ादायी होता है, वैसे ही दूसरे के मांस काटने पर उसे भी पीड़ा होती है। जो जीवन-भर के लिए मांस को त्याग देता है, वह स्वर्ग में विशाल स्थान पाता है।"^1

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवान् उवाच

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ ६:१७ ॥

पदच्छेद

युक्त-आहार-विहारस्य, युक्त-चेष्टस्य कर्मसु,

युक्त स्वप्न-अव-बोधस्य, योगः भवति दुःख-हा।

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