अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग
श्लोक 7:14

अर्थ

भगवान श्री कृष्ण बोले

निश्चय ही यह मेरी त्रिगुणमयी दैवी माया बड़ी जबरदस्त है, मगर जो केवल मुझ {एक सर्वोपरि परमेश्वर} को ही भजते हैं {देवताओं को नहीं}, वे इस माया को लाँघ जाते हैं, अर्थात संसार-सागर से पार उतर जाते हैं।

टीका

पराप्रकृति ही माया है। माया को अविद्या भी कहते हैं, जो भव-बंधन के लिए उत्तरदायी है। व्यवहार में यह माया क्रमशः कैसे नष्ट होती है — इसे नारायण के अवतार कहे जाने वाले कपिल मुनि ने भागवतपुराण के तृतीय स्कंध के सत्ताइसवें अध्याय में अपनी माता देवहूति को बताया है। उनके उपदेश का एक अंश यहाँ उद्धृत है, जो "मामेव ये प्रपद्यन्ते" के अर्थ को और स्पष्ट करेगा —"माताजी! जिस प्रकार अग्नि का उत्पत्ति-स्थान अरणि, अपने ही भीतर उत्पन्न अग्नि से जलकर भस्म हो जाती है — उसी प्रकार, निष्काम भाव से किए हुए स्वधर्म-पालन द्वारा अंतःकरण की शुद्धि होने पर, भगवत्कथा को दीर्घकाल तक सतत सुनते रहने से पुष्ट हुई मेरी तीव्र भक्ति से, तत्त्व-साक्षात्कार कराने वाले ज्ञान से, प्रबल वैराग्य से, व्रत-नियम आदि सहित ध्यान के अभ्यास से, और चित्त की प्रगाढ़ एकाग्रता से — मनुष्य की प्रकृति, अर्थात अविद्या, निरंतर क्षीण होती हुई धीरे-धीरे विलुप्त हो जाती है।

फिर वह प्रकृति अपने स्वरूप में स्थित और स्वतंत्र हुए उस पुरुष का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती।

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवान् उवाच

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ ७:१४ ॥

पदच्छेद

दैवी हि एषा गुण-मयी मम माया दुरत्यया;

माम् एव ये प्र-पद्यन्ते, मायाम् एताम् तरन्ति ते।

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