अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग
श्लोक 7:4,5

अर्थ

भगवान श्री कृष्ण बोले

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—इस तरह यह आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकार के भेदों वाली तो अपरा (प्रत्यक्ष, दृश्यमान, अनुभवगम्य) अचेतन और निम्न प्रकृति है, और हे अर्जुन! इससे दूसरी को, जिसके द्वारा यह समस्त {जैविक-अजैविक} संसार धारण किया जाता है, मेरी परा—अनुभव से परे—उच्च प्रकृति जानो, जो एक अविभाज्य परमात्मा के अनेक व्यक्तिगत आत्माओं अर्थात जीवात्माओं के रूप में प्रकट होने के लिए उत्तरदायी शक्ति है।

टीका

इसी 'परा' प्रकृति (जो सामने नहीं हो, परे या अप्रत्यक्ष हो) को ईश्वर की 'शक्ति', ईश्वर की माया आदि नामों से जाना जाता है, जो सारे चेतन-अचेतन जगत की रचना में 'माता' की भूमिका अदा करती है। इस संदर्भ में श्लोक 14:3-4 देखें। दुर्गा, सीता, राधा आदि इसी परमशक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं—"श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी, जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की।" (मानस, अयोध्याकांड, 125: छ)

प्रकृति दो रूपों में होती है—परा-प्रकृति और अपरा-प्रकृति। यह वैसे ही है जैसे ईश्वर दो रूपों में रहते हैं—परब्रह्म और अपरब्रह्म। अपरब्रह्म कहते हैं सगुण-साकार ईश्वर को, नारायण को, जो देखे-सुने जा सकते हैं। परब्रह्म निराकार ईश्वर हैं, इन्द्रियगम्य नहीं।

इसी प्रकार अपरा-प्रकृति कहते हैं साकार प्रकृति को, जो इंद्रियों की पहुँच से परे नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष है—जैसे धरती, सूर्य, नदी, पहाड़, हमारा शरीर आदि सहित ब्रह्मांड। परा-प्रकृति कहते हैं निराकार प्रकृति को, जो इन्द्रियगम्य नहीं है, निराकार है। उसी निराकार प्रकृति से साकार, दृश्यमान प्रकृति का जन्म होता है।

श्लोक 7:4

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवान् उवाच

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।

अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ७:४ ॥

पदच्छेद

भूमिः, आपः, अनलः, वायुः, खम्, मनः, बुद्धिः, एव च

अहङ्कारः—इति इयम् मे भिन्ना प्रकृतिः अष्टधा।

श्लोक 7:5

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवान् उवाच

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।

जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ७:५ ॥

पदच्छेद

अ-परा इयम् इतः तु अन्याम् प्रकृतिम् विद्धि मे पराम्।

जीव-भूताम्, महा-बाहो— यया इदम् धार्यते जगत्।

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