अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग
श्लोक 9:30

अर्थ

भगवान श्री कृष्ण बोले

यदि कोई अत्यंत पापी-दुराचारी भी अनन्य भाव से मुझको भजता है, तो वह सज्जन ही मानने योग्य है, क्योंकि वह सम्यक या पवित्र निश्चय वाला हो गया है, {क्योंकि उसने पवित्र परमेश्वर की शरण में आने का निश्चय कर लिया है}।

टीका

इस श्लोक से कुछ लोग यह पूछ सकते हैं कि ईश्वर का भक्त बनने वाले पापियों, दुष्कर्मियों तथा अपराधियों को 'साधु' कह कर भगवान उन्हें अनुचित संरक्षण तो प्रदान नहीं कर रहे? इस शंका का समाधान अगले ही श्लोक में कर दिया गया है। इसीलिए इन दोनों श्लोकों को साथ ही स्मरण करना चाहिए। अगला श्लोक यह कहता है कि ज्यों ही एक पापी भगवान का भक्त बनता है, वह धर्मात्मा भी बन जाता है। अपराधी जल्द ही धर्मात्मा बन जाए — इससे अच्छा और क्या हो सकता है?

दुराचारी, पापी, दुष्कृतकारी आदि समकक्ष या समानार्थी शब्द हैं। पूर्व में श्लोक 4:36 के संदर्भ में वाणी, मन और शरीर के पापों पर थोड़ा प्रकाश डाला गया था। यहाँ थोड़े और विस्तार से दुराचार या पाप की एक सूची अध्याय 26, पंचम स्कंध, भागवत पुराण से दी जाती है, ताकि पाठकों में 'दुराचार' को लेकर अधिक स्पष्टता विकसित हो सके^12 —

यौन-आचार संबंधी दुराचार

पर-स्त्रीगमन^13 {बलात्कार, पर-पुरुषगमन} ("rape", "adultery")

अगम्य स्त्री^14 या अगम्य पुरुष^15 के साथ संभोग ("incest"), व्यभिचार, बलात्कार

पशु के साथ व्यभिचार

पशु-पक्षी-कीट-पतंग के प्रति दुराचार:

पशुबलि

जीव-हिंसा ^16

जीवों को पीड़ा पहुँचाना ^17

जीवित पशुओं और पक्षियों का गला रेतना

न्यायिक और प्रशासनिक दुराचार:

राज-कर्मचारी (न्यायाधीश, पुलिस अधिकारी या अन्य अधिकारी) द्वारा किसी निरपराध को दंड

झूठी गवाही

राजा (शासक) या राजपुरुष^18 (अधिकारी) द्वारा धर्म-मर्यादा का उच्छेद

राज-अधिकारी या राज-कर्मियों द्वारा जनता या व्यापारियों की विविध प्रकार से लूट-पाट और भयदोहन ("extortion")

रामचरितमानस में भगवान राम यह बताते हैं कि जिस राजा के अधीन प्रजा दुखी रहती है वह राजा अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है—'जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।।' (अयोध्याकांड 70:3; भागवतपुराण 1:17:10 भी देखें)।

आर्थिक दुराचार:

दूसरों की धन-संपत्ति का हरण

चोरी-डकैती

धन कमाने, बढ़ाने और बचाने के लिए पाप करना (भ्रष्टाचार, कालाबाजारी आदि)

माता-पिता के प्रति अपराध:

माता-पिता से विरोध {एवं उन्हें कष्ट देना}

कुछ अन्य दुराचार:

किसी का घर जलाना, विष देना

अतिथि को क्रोध-भाव से देखना

सिर्फ अपने कुटुंब की परवरिश में लगे रहना (अर्थात परोपकार-आदि नहीं करना, दान नहीं देना)।

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवान् उवाच

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।

साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ९:३० ॥

पदच्छेद

अपि चेत् सु-दुराचारः भजते माम् अनन्य-भाक्,

साधुः एव सः मन्तव्यः, सम्यक् व्यवसितः हि सः।

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